सारंगपुर में तीसरी बार संजावली प्रतियोगिता: टेटवाल बोले- माताओं-बहनों ने पीढ़ियों तक सहेजी लोकसंस्कृति
सारंगपुर। विलुप्त होती लोकपरंपरा संजावली को सहेजने और नई पीढ़ी को मालवी संस्कृति से जोड़ने के लिए सारंगपुर में तीसरे वर्ष संजावली प्रतियोगिता एवं कला महोत्सव आयोजित किया गया। सेवा सदन कार्यालय परिसर में ग्रामीण अंचलों की छात्राओं ने संजा के मांडने बनाए और पारंपरिक लोकगीत व लोकनृत्य प्रस्तुत किए। राज्यमंत्री डॉ. गौतम टेटवाल ने कहा कि माताएं-बहनें न होतीं तो तीज-त्योहारों और लोकपरंपराओं को जीवित रखना मुश्किल हो जाता। दादी-नानी और माताओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकगीतों, कलाओं और संस्कारों को सहेजकर रखा है।
विधायक बनने के बाद शुरू कराई प्रतियोगिता

डॉ. टेटवाल ने कहा कि विधायक बनने के बाद संजावली पर्व को विलुप्त होने से बचाने और बेटियों में इसके प्रति उत्साह बनाए रखने के लिए प्रतियोगिता शुरू कराई। लोककला हमारी सांस्कृतिक पहचान है। जब बेटियां अपनी दादी-नानी से लोकगीत सीखती हैं और संजा की आकृतियां बनाती हैं, तो परंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं। उन्होंने विद्यालयों में लोकगीत, लोककथाओं और पारंपरिक कलाओं से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात कही।
मालवी गीतों से गूंजा परिसर

प्रतियोगिता में छात्राओं ने ‘कौड़ियों बामन सांझ को क्यों लेने आयो’ और ‘छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाय, जिसमें बैठी संजा बाई सासरे जाय’ जैसे पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए। कस्तूरबा गांधी छात्रावास की छात्राओं ने मालवी लोकनृत्य किया, जबकि सांदीपनि विद्यालय की छात्राओं ने संजा गीत गाए।
भ्याना, गुलावता, धनौरा, पचोर, पाड़ल्यामाता, आमलारोड़, पांदा और संडावता सहित विभिन्न ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों की छात्राओं ने भाग लिया।
गीत गायन में गुलावता, मांडना में पाड़ल्यामाता प्रथम
प्रतियोगिता के अंत में विजेता टीमों को बैग और शील्ड देकर सम्मानित किया गया।
गीत गायन प्रतियोगिता
– प्रथम: गुलावता संकुल
– द्वितीय: उत्कृष्ट मॉडल स्कूल
– तृतीय: शासकीय विद्यालय, उड़नखेड़ी
संजा मांडना प्रतियोगिता
– प्रथम: शासकीय विद्यालय, पाड़ल्यामाता
– द्वितीय: शासकीय कन्या विद्यालय, सारंगपुर
– तृतीय: सांदीपनि विद्यालय, मऊ
16 दिन तक दीवारों पर बनाते हैं संजा के मांडने
मालवा-निमाड़ में संजा या संजावली का पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष के दौरान लगभग 16 दिनों तक मनाया जाता है। किशोरियां घरों की दीवारों पर गाय के गोबर से संजा की आकृतियां बनाकर फूल-पत्तियों से सजाती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं। लोकमान्यताओं में इस परंपरा को मां पार्वती की आराधना और कुंवारी कन्याओं की मनोकामनाओं से भी जोड़ा जाता है।
डॉ. टेटवाल ने कहा कि बेटियां संस्कृति की संवाहक होने के साथ राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आयोजन में श्रीमती रेखा टेटवाल, नगर पालिका उपाध्यक्ष भावना निलेश वर्मा, सरपंच श्रद्धा पालीवाल, डॉ. सरिता यादव, पूजा विजयवर्गीय, संगीता गुप्ता, कुसुम भारतीय, मंडल अध्यक्ष महेश पुष्पद, निर्मल जैन, बद्रीलाल बामनिया, सुशील व्यास, राधेश्याम माहेश्वरी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी सुरेश बीरमाल और बीआरसी बी.एल. वर्मा सहित अन्य लोग मौजूद रहे। संचालन मॉडल स्कूल की प्राचार्य एवं शिक्षिका बबीता मिश्रा ने किया।
